Monday, 8 March 2021

महिला दिवस


Arshad Gazaal

  B.Sc Computer Science 


यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता :

                                             इस श्लोक का हमारे बीच महत्व कितना है इस बात का अंदाज़ा हम भारत में महिलाओं कि स्थिति को देखकर समझ सकते हैं .

                                             आज महिला दिवस है , इस दिन पुरुष महिलाओं को लेकर झूट बोलते हैं स्वयं महिलाएँ खुद को दिलासा देने के लिए हर तरह से अपनी झूटी हौसला अफजाई करती हैं .. कुछ आकंड़ों को जानकर आपको इस बात का अंदाज़ा हो जाएगा . पिछले ही हफ्ते up में एक पिता सर्वेश ने अपनी बेटी नीलम का सर कलम कर दिया . राजस्थान के दौसा में एक पिता ने दलित लड़के से शादी करने पर अपनी बेटी कि हत्या कर दी. गाँव कि न जाने कितनी बेटियों ने स्कूल का दरवाज़ा तक नहीं देखा .

दुनिया के कुछ संपन्न देशों में महिलाओं की स्थिति के बारे में हुए एक शोध में भारत आख़िरी नंबर पर आया है.

                           भारत के 19 देशों की सूची में सबसे अंतिम पायदान पर रहने के लिए कम उम्र में विवाह, दहेज, घरेलू हिंसा और कण्या भ्रूण हत्या जैसे कारणों को गिनाया गया है.... सर्वेक्षण कहता है कि कई मामलों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को समाज में स्वीकार्य भी समझा जाता है. और यही समाज प्रति वर्ष महिला दिवस पर अपने वाट्सएप और फेसबुक जैसे सोशल अकाउंटस को महिला दिवस कि शुभकामनाओं से सजाता रहता है . रिपोर्ट में एक सरकारी अध्ययन का उल्लेख किया गया है  , जिसमें 51 प्रतिशत पुरूषों और 54 प्रतिशत महिलाओं ने पत्नियों की पिटाई को सही ठहराया था . आश्चर्यजनक है न . तो ऐसे विचारों के बीच में क्या महिला दिवस कि झूटी शुभकामनाएँ देना ठीक है ?

                                आज़ादी के 70 वर्ष से अधिक का समय बीत चूका है ,  लेकिन भारतीय समाज आज भी अपनी दकियानूसी विचारधारा से आज़ाद नही हो पाया यदि आप भारतीय संविधान में महिलाओं के अधिकारों के बारे में पढेंगे तो शायद आपको अपनी दिनचर्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा इन कानूनों को पढने में देना होगा . इन कानूनों को पढ़ते समय आप का सीना शायद उतना चौड़ा हो जायगा जिसका आपको अंदाज़ा भी नहीं है और आप अपने प्रिय देश भारत को विश्व गुरु , भारत माता , और न जाने ऐसे कितनी उपाधियों से चिल्लाते हुए फूले नही समाएंगे . 


                                        लेकिन विडम्बना तो यह है कि इतने सारे कानूनी प्रावधानों के होने के बावजूद देश में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में कमी होने की बजाय वृध्दि हो रही है।  राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो( NCRB) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में प्रतिदिन 100 महिलाओं का बलात्कार हुआ और 364 महिलाऐं यैन उत्पीड़न का शिकार हुईं। इस वर्ष केवल बलात्कार के 36735 मामले दर्ज किए गये.

इस संबंध में देश में हर घंटे लगभग 72 आपराधिक मामले दर्ज किए जाते हैं। अर्थात हर एक मिनट में एक स्त्री का बलात्कार होता है , आप जब ये पोस्ट पढ़ रहे होंगे तो इस दौरान भी देश में कहीं न कहीं किसी स्त्री के साथ बलात्कार या यौनउत्पीणन हो रहा होगा .... ये जान कर तो और भी निराशा होती है जब इन काले आंकड़ों में बहुत से ऐसे नंबर छूट जातें हैं जिनपर लोग केस दर्ज नहीं करवाते . और ये आंकड़े तम्रत्यु हमारे सामने नही आते और बेहतर भी है कि सामने न आयें वरना उन आंकड़ों को देख कर यदि आप को म्रत्यु न आये तो फिर शायद आप इंसानियत के दर्जे से बाहर होंगे . 

यह स्थिति भयावह है। बेहद भयावह

                                  हालाकि कुछ महिलायें इन सभी चुनौतियों से पार पाकर विभिन्न क्षेत्रों में देश के सम्माननीय स्तरों तक भी पहुंची हैं, जिनमें श्रीमती इंदिरा गांधी, प्रतिभादेवी सिंह पाटिल, सुषमा स्वराज, निर्मला सीतारमण, महादेवी वर्मा, सुभद्राकुमारी चौहान, मैरी कॉम आदि . लेकिन क्या ये पर्याप्त है ? देश में महिलाओं कि स्थिति पर खुश होने के लिए , महिला दिवस कि शुभकामनाएँ देने के लिए ? 

बिल्कुल नहीं . इस हेतु शायद हमे अभी और कई दशक लगेंगे .  

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